Saturday, 9 June 2018

दर्पण तोड़े जाएंगे

आज नया आदेश किया है साहब ने
दर्पण जितने भी हैं तोड़े जाएंगे।

क्यों रोते हो?
दोषी हो तुम
तुमने सच की राह चुनी थी
लोकतांत्रिक
राजाओं की
बातें तुमने नहीं सुनी थी।

सत्य बोलने वाला गुनहगार होगा
जो भी प्रश्न करेगा गिरफ्तार होगा

आज नया आदेश किया है साहब ने
जितने हत्यारे हैं, छोड़े जाएंगे।

सज़ा मिलेगी
उमरकैद की
तड़पोगे, पछताओगे तुम
काल कोठरी
ऐसी होगी
रोओगे, घबराओगे तुम

तुमको खामोशी सिखलाई जाएगी
उनके मन की बात सुनाई जाएगी

आज नया आदेश किया है साहब ने
सारे सीधे रस्ते मोड़े जाएंगे।

                  - मोहित

Tuesday, 29 May 2018

आरुष्म

तुम सुनो! मैं तो तुम्हें बस प्यार करना चाहता हूँ।

बैठकर गंगा किनारे घाट की उन सीढ़ियों पर
एक चुटकी लालिमा लेकर किसी दिन सूर्य से फिर
मैं तुम्हारी माँग का शृंगार करना चाहता हूँ
तुम सुनो! मैं तो तुम्हें बस प्यार करना चाहता हूँ।

अधर पर रखकर के रक्तिम पंखुड़ी ताजे कमल की
और मलकर रंग गालों पर गुलाबों का गुलाबी
मैं तुम्हारे रूप को गुलजार करना चाहता हूँ
तुम सुनो! मैं तो तुम्हें बस प्यार करना चाहता हूँ।

मैं तुम्हारी इक हथेली को हथेली में पकड़कर
और काँधे पर टिकाकर सिर तुम्हें निज अंक भरकर
स्वप्न जो देखे उन्हें साकार करना चाहता हूँ
तुम सुनो! मैं तो तुम्हें बस प्यार करना चाहता हूँ।

                  

Sunday, 13 May 2018

मातृ दिवस

आज नींद खुली तो सबसे पहले माँ को फ़ोन किया। पहले तो वह थोड़ा परेशान हुईं कि आज सुबह सुबह मैंने क्यों फ़ोन किया है, फिर जब उन्हें आज के दिन की शुभकामनाएं दीं, तो वह बहुत खुश हुईं। मेरी परीक्षाओं के बारे में पूछा। फ़ोन रखने से पहले एक अजीब सा सवाल किया उन्होंने "तुमने मुझे बधाइयाँ दी हैं, या आज के दिन को"। मैंने कुछ जवाब दिए बिना 'प्रणाम' कहा और फ़ोन रख दिया, क्योंकि मेरे फ़ोन में बस 1 ही मिनट बात करने का बैलेंस था, जिसमें से 50 सेकंड से अधिक हो चुके थे। माँ के मोबाइल में भी बैलेंस नहीं था, तो बात वहीं बन्द करनी पड़ी।

मैं इस प्रश्न पर विचार करता रहा, कि कितनी गहरी सम्वेदनाओं से युक्त है यह प्रश्न। बार-बार दिमाग में वही सवाल गूँज रहा था "तुमने किसे बधाइयाँ दी हैं, मुझे या आज के दिन को?"
रोज मेरी आदत है, कि सोकर उठता हूँ, तो धरती मैया को तीन बार प्रणाम करके दर्पण में अपना चहेरा देखता हूँ, न कि हाथ की लकीरें। लकीरें इसलिए नहीं देखता, क्योंकि लकीरों में जो लिखा होगा, वो तो होकर ही रहेगा। मुझे तो ये देखना रहता है, कि मेरी आँखों की चमक मुझे कहाँ तक ले जाएगी। आज दर्पण देखने की हिम्मत न हुई, क्योंकि मैं खुद से नजरें मिला पाने में असमर्थ था और वजह, बस वो छोटा सा सवाल, जिसका जवाब खोजने की कोशिश में मैं अब भी था।

स्नान ध्यान के बाद थोड़ा जल पिया, और फिर उसी स्थान पर शून्य सा बैठा रहा। काफी देर बाद मोबाइल पर एक नोटिफिकेशन ने मेरा ध्यान तोड़ा। मैंने पापा को फ़ोन लगाया, और उनसे ही बात करके रख दिया। हिम्मत नहीं जुटा पाया इस बात की, कि मम्मी से फिर बात करूँ।
नाश्ता रोज से थोड़ा कम किया, 2 की जगह सिर्फ 1 आलू का पराठा, और चाय।

फेसबुक से होकर गुजरा, तो बहुत सी कविताएं, ग़ज़लें, शेर, लेख पढ़ने को मिले। कुछ तस्वीरें भी मिलीं, जो सच को उजागर करती हैं।

राजेश राही जी ने पोस्ट किया था-
" तुमने सौ बार जिन रिश्तों की दुहाई दी है
क्या कभी उनमें वो शिद्दत भी दिखाई दी है
माँ ने फिर देख लो लौटा दिया बचपन मेरा
माँ ने फिर खोल के पल्लू से मिठाई दी है"

मुनव्वर राना जी की पंक्तियों से तो पूरा फेसबुक भरा था। जैसे-

"मेरी ख्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपटूँ कि बच्चा हो जाऊँ।"

"मेरे सारे गुनाहों को वो धो देती है
माँ गुस्से में होती है तो रो देती है"

"किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकां आई
मैं घर मे सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में माँ आई"

आलोक श्रीवास्तव जी की रचना भी पढ़ने को मिली-

"चिंतन, दर्शन, जीवन, सर्जन, रूह, नजर पर छाई अम्मा
सारे घर का शोर-शराबा, सूनापन, तन्हाई अम्मा।

बाबू जी गुजरे आपस में सब चीजें तकसीम हुईं तब
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से आई अम्मा।"

ऐसे और भी बहुत से लोगों ने बहुत कुछ लिखा था। नाम और पंक्तियाँ गिनाते गिनाते तो सुबह हो जाएगी।
कुछ लोगों ने आदर्शों से उठकर हकीकत लिखा था।

और कुछ लोगों ने कुछ नहीं। मैंने दरअसल कुछ विशेष अवसरों पर कुछ पोस्ट करने से दूरी बना ली है। बस सबकी पोस्ट पढ़ लेता हूँ, और समाज के बारे में फेसबुक पर व्यक्त उनकी चिंताओं को समझने की कोशिश करता हूँ, जो सिर्फ फेसबुक तक ही रहती हैं, समाज में कभी नहीं पहुँचती।

आज भी यही किया दिन भर। सबको पढ़ा बारी बारी से दिन भर। एक फ़िल्म देखी, परीक्षा की तैयारी की, एक मित्र से मिला, और सोया।

दिन भर सब चीजों का अवलोकन करने के बाद, शाम को जब चाय पीकर फिर हॉस्टल आ रहा था, तभी फिर दिमाग में सुबह का वो प्रश्न आया, जिसे मैंने अनुत्तरित छोड़ रखा था। मैंने पापा को फ़ोन लगाया। जैसा कि हमेशा होता आया है, उन्होंने काल बैक की। मैंने पापा से बात की, उनसे अपने फ़ोन में बैलेंस डलवाने का निवेदन किया। किन्तु मम्मी से बात करने को न कह सका। दरअसल, बात ही क्या करता, क्योंकि जहाँ बात छोड़ी थी, वहीं से शुरू कर पाने का सामर्थ्य न था मुझमें।

सच तो ये है, कि सच से वाकिफ हो गया हूँ,  और सच ये है, कि मैंने माँ को नहीं, आज के दिन को ही बधाई दी थी।

मैं रोज सुबह तो उन्हें फ़ोन नहीं करता, अक्सर शाम को करता हूँ, या रात में डिनर के बाद। तो सिर्फ आज ही क्यों किया?
माँ के लिए सिर्फ एक दिन?
इतना भी तो बिजी नहीं रहता हूँ, कि उन्हें फ़ोन न कर पाऊँ।

माँ हमेशा मुझे सिखाती रहती है, और आज उनके इस सवाल ने जीवन की सबसे बड़ी सीख दी।
आज समझ आया #मातृ_दिवस का असली मतलब।

और हाँ, कल से हाथ की रेखाएँ और आँखों की चमक, दोनों देखूँगा, ताकि जान सकूँ, कि मेरे सपने मेरी लकीरों के मुताबिक बदल रहे हैं, या फिर मेरी लकीरें, मेरे सपनों से एकीकार हो रही हैं।

धन्यवाद माँ, धन्यवाद मातृ दिवस।

जानता हूँ, उपकारों से उऋण नहीं हो सकता, होना भी नहीं चाहता हूँ। बस बेटे का धर्म निभाता जाऊँगा, पूरी ईमानदारी से।

इतना ही कहूँगा, और करूँगा भी-

"चार दिनों के जीवन में बस इतना सा उद्देश्य मेरा
जब तक साँसें हैं अपना कर्तव्य निभाता जाऊँ मैं।"

Saturday, 28 April 2018

कैसे प्यास बुझाऊँ मैं ?

पनघट पनघट काँटे बिखरे
कैसे प्यास बुझाऊँ में ?

जहाँ कहीं मैं नजर घुमाता
गूँगे, अंधे, बहरे दिखते
काली करतूतें, जुबान,दिल
कालिख पोते चेहरे दिखते

काली सड़कों-सन्नाटों में
कैसे मंजिल पाऊँ मैं ?

कलरव, सूनेपन में बदला
सूरज आज नहीं जागा
सिंहासन ने मौन धरा पर
मन का पाप नहीं भागा

उपवासी मुद्रा लालचमय
कैसे खुशी मनाऊँ मैं ?

मंदिर के परिसर में देखो
गौरैया के पंख कट रहे
उन्हें बचाए कौन यहाँ तो
आपस मे इंसान बँट रहे

लुटती मर्यादा भारत की
कैसे चुप हो जाऊँ मैं ?

Tuesday, 10 April 2018

ग़ज़ब नीति है

ग़ज़ब नीति है
प्रतिभावानों के पग, पल पल काटे जाते हैं।

जिसकी सबसे गहरी जड़ है
सबसे सीधा जिसका तन
फलदायी जो सबसे ज्यादा
पत्तों में है चिकनापन
ग़ज़ब नीति है
हरे भरे जो पेड़ यहाँ वो काटे जाते हैं।

रोज उपद्रव करने वालों
के हाथों सिंहासन है
कौन यहाँ कब क्या कर डाले
हर चेहरा दुःशासन है
ग़ज़ब नीति है
बच्चे नित खानों खानों में बाँटे जाते हैं।

अवसर वाली सभी कुंजियाँ
दूर्योधन की ओर पड़ीं
सद्भावों की जो बातें हैं
विदुर बनी उस छोर खड़ीं
ग़ज़ब नीति है
कोलाहल की रक्षा में सन्नाटे जाते हैं।

Tuesday, 27 March 2018

तुम खुशियाँ लेकर आते हो

जब कभी कभी यह अपना मन उलझा उलझा से लगता है
तुम आते हो आ करके फिर उलझन को दफ़ना जाते हो
तुम खुशियाँ लेकर आते हो।

होकर मायूस कभी जो मैं आँखों मे आँसू भरता हूँ
तुम आते हो आ करके फिर आँसू सारा पी जाते हो
तुम खुशियाँ लेकर आते हो।

जब दिल टूटे, आँखे रोतीं, पीड़ा का अंबार लगे
तुम आते हो, आ करके फिर पीड़ा सारी हर जाते हो
तुम खुशियाँ लेकर आते हो।

मौन

हो शिक्षा या कि हो शादी  नहीं तुम बात सुनते हो
किया हर पल जो मन आया नहीं जज्बात सुनते हो
बताओ फिर स्वयं को क्यों कहा नारी के हो रक्षक
घरों में कैद बेटी को न तुम आजाद करते हो
वो घर की रोशनी सी है चमक उससे ही है घर की
महकता बाग का हर फूल उसने गन्ध यूँ भर दी
उसी को मौन कर तुमको है गौरव मर्द होने का
नरक से है बुरा यह मौन जीवन उम्र ढोने का
बढ़ाई शान तुमने सोचकर बिटिया विदा कर दी
मगर सच है कि उस इक मौन ने खुशियाँ विदा कर दी
कभी उसको भी सुन लेते जो तुमको पूजती हर पल
पिता के मान रख लूँ मैं सँजोया ख्वाब ये प्रति पल
जो उससे पूछ लेते "खुश हो बेटी" तो भला होता
अरे इक बार तो उसकी भी मंशा को सुना होता
मगर तुम हो पुरुष, फिर बाप हो, ये सोच भारी थी
मर्द होने की तुममें इक अजब सी ही बीमारी थी
तुम्हारी सोन चिड़िया आज भी रौनक से घर भरती
अगर एक बार भी उसकी भी तुमने राय ली होती
बहुत कुछ है सहा फिर सोचकर तब ही जहर खाया
हमेशा के लिए चुप होके उसने तुमको समझाया
"अरे जो बाप हो तो राय बेटी की भी सुन लेना
जो उसके ख्वाब खुशियों के हैं उसमें कुछ तो चुन लेना
महज कुछ गिफ्ट देकर बाँधना मत उसके जीवन को
वो खुलकर जी सके इसके लिए इक राह बुन देना"

बचपन जाने किस ओर गया

बचपन जाने किस ओर गया।

माँ उल्लसित हो जाती थी जिनकी प्यारी सी बातों से
अब हत्याएं हो जाती हैं नन्हें नन्हें उन हाथों से
माँ का प्यार भूल करके बच्चा जाने किस छोर गया
बचपन जाने किस ओर गया।

आकर आभासी दुनिया में रिश्तों की मर्यादा भूले
भूले हैं प्रकृति प्रेम और भूले हैं सावन के झूले
भूल भुलैया का चक्कर तो ले पतंग की डोर गया
बचपन जाने किस ओर गया।

तुम्हारे इंतजार में

जानता हूँ
मुझे कोई हक़ नहीं
तुम्हारी तस्वीर को देखने का
तुम्हारे बिखरे बालों में खोने का
तुम्हारे लाल गाल
और वो आंखें
डूब जाना चाहता हूँ मैं उनमे
तुम्हारे सुर्ख होठ
खुश हो जाता हूँ तुम्हें मुस्कुराते देख
चूम लेता हूँ तुम्हारा माथा मैं
ताकि बता सकूँ
फ़िक्र होती है मुझे तुम्हारी।

याद आती हो तुम
बस यही तस्वीर तो है
गले लगाकर रोता हूँ इन्हें
चीख़ता है हृदय मेरा
पर दब जाती है
आंसुओं से लिपटी गर्म साँसों में मेरी आवाज।

याद आता है हर वो पल
जिनमें तुम हो
तुम्हारी बातें
तुम्हारे सपने
तुम्हारा दर्द
तुम्हारी हँसी
और वो गीत
अक्सर ही गुनगुनाती थी जिसे।

कभी तो आओगी
इन बन्धनों को तोड़कर
मेरे पास।

देख लेना आकर
उस वक़्त जब अंतिम साँसे चल रही होंगी मेरी
मैं फिर पुकारूंगा तुम्हें
खुली रहेंगी मेरी आँखें
तुम्हारे दीदार को
तुम्हारे इंतजार में
तुम्हारे प्यार में।


तुम संग जीना चाहती हूँ मैं

नहीं हूँ मैं तुम्हारे पास
याद भी न करोगी मुझको
भुला दोगी
वो सारे वादे?
वो सारी बातें?
एक बात पूछूँ
सच कहना
अलग कर पाओगी ज़िन्दगी के ये पन्ने खुद से
कैसे मिटाओगी
दरख्तों पर खींचे गए अपने नाम।

मेरा क्या है?
जी लूँगा
तुम्हारी यादों में
अकेले
चुपचाप।

यादें तुम्हारी मुस्कुराहट की
यादें तुम्हारे श्रृंगार की
यादें तुम्हारे बार-बार
पलकें उठाकर गिराने की।

दर्द होता है दिल में
कराह उठता हूँ अक्सर।

सच कहूँ
आदत हो गयी है नम आँखों की
अकेले..गुमशुम..चुपचाप।
तुमको तलाशता हूँ तस्वीरों में
यूँ लगता है
जैसे अभी आओगी
और थाम कर मेरा हाथ
मृदु स्वर में
हृदय की गहराई से
कुछ सोच कर
फिर कहोगी
"तुम संग जीना चाहती हूँ मैं"

तुमको देखा तो जाना

तुमको देखा तो ये जाना है मैंने
जीवन धन्य हुआ ये माना है मैंने।

तकलीफें कितनी हो, बाजी मुश्किल हो
जीत के ही दम लूँगा ठाना है मैंने।

 मुझको सुनकर तुम मेरे हो जाओगे
छेड़ दिया अब राग सुहाना है मैंने।

चाँद के जरिये मैं तेरा दीदार करूँगा
खोज लिया यह एक बहाना है मैंने।

सागर में गहराई कुछ भी नहीं प्रिये
आँखों मे ये डूब के जाना है मैंने।

प्रेम-पत्र

प्रिये! तुम कहाँ हो? कैसी हो? इन सबके बारे में मुझे कुछ नहीं पता। सिर्फ कल्पनायें कर सकता हूँ, कि जहाँ हो, कुशल से हो। बीते एक साल में जीवन...