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Wednesday, 19 September 2018

ग़ज़ल (हवा)

जाने कितनी खुशबुओं को साथ ले बहती हवा
ले के संदेशों को आई ज्यों कि हो चिट्ठी हवा।

पास कुछ पल बैठकर देखो कि ग़म मिट जाएंगे
बह रही है खिड़कियों से माँ की थपकी सी हवा।

ख़ुशनुमा मौसम बनाने, दूर करने को उमस
सागरों की गोद से बादल चुरा लाई हवा।

ले पतंगें दूर तक, आकाश भर मुस्कान की-
बन वजह, सबके हृदय को खूब है भाती हवा।

रूप को अपने तरल करके मधुरता भर रही
ज्यों हो कोई दार्जिलिंग के चाय की प्याली हवा।

मुस्कराती है वो लड़की और शर्माती भी है
जानती है इस समय भी देखती होगी हवा।

तुम भी दो पल बैठकर के हाले दिल को बाँट लो
हर अकेले शख़्स से है बात कुछ करती हवा।

लेके 'मोहित' के हृदय की धड़कनों की कम्पनें-
जाती है उस तक, व उसकी धड़कनें लाती हवा।

Saturday, 1 April 2017

आज प्यार आया फिर उस पर

जिसके संग रहने के सपने दिन रात बुना मैं करता था,
जिसकी बातों का मधुर गान सदा साथ मेरे चलता था,
एक काम बस मेरा बतियाना जिससे था दिनभर,
आज प्यार आया फिर उस पर......

जिसने जीवन को मेरे मृदु स्वर में सदा संजोया था,
खिले पुष्प की खुशबू को साँसों में मेरी पिरोया था,
जीवन जिसने काव्यमय किया जिसने प्यार दिया हर पल,
आज प्यार आया फिर उस पर......

Friday, 31 March 2017

मुझे प्यार का रस पिला दो प्रिये

मुझे दिल में अपने बसा लो प्रिये
मुझे प्यार का रस पिला दो प्रिये।

जब से जन्मा तू ही मेरे दिल में तो है
हर रूप बस मेरा तुझसे ही है
तू सुबह मेरी, तू ही शाम है
तू काम मेरा तू आराम है
कंटीले सफर में सुमन-सी तू है
गर्मी में ठंडी पवन-सी तू है
तू मेरी उपमा, तू अनुप्रास है
तू वीरता मेरी, तू हास है
मुझको शृंगार अपना बना लो प्रिये
मुझे प्यार का रस पिला दो प्रिये।

छिप छिप अश्रु बहाता हूँ

प्रिय की यादों में खोकर
जब रोने का मन होता है
छिप छिप अश्रु बहाता हूँ।

उसकी प्यारी प्यारी बातों का हर क्षण मेला होता है

क्या भूलूँ क्या याद करूँ बस यही झमेला होता है

मनचाहे कामों से नफरत हो जाती है

औरों की बातें झुंझलाहट दे जाती है

मायूसी घर कर जाती है

मन जस तस बहलाता हूँ

छिप छिप अश्रु बहाता हूँ।

उसकी यादों का जाल सदा चौतरफा मेरे होता है

रोम रोम मेरे तन का तड़पन में उसकी रोता है

खुशियों के रंगमंच का पर्दा गिरता है

पुस्तक की पृष्ठों में चेहरा देखता है

चीख हृदय से उठती है

गीत प्यार के गाता हूँ

छिप छिप अश्रु बहाता हूँ।

प्रेम-पत्र

प्रिये! तुम कहाँ हो? कैसी हो? इन सबके बारे में मुझे कुछ नहीं पता। सिर्फ कल्पनायें कर सकता हूँ, कि जहाँ हो, कुशल से हो। बीते एक साल में जीवन...