Tuesday, 27 March 2018

जीवन की सार्थकता

यहाँ
तुमसे सैकड़ों किलोमीटर दूर
छात्रावास में
अकेले बैठकर
दुआएँ कर रहा हूँ
तुम्हारे लिए
कि तुम सफल हो
हर उस काम में
जो तुम करती हो।
हमेशा तुम्हारे चेहरे पर
वही मनमोहक मुस्कान हो
जो तब थी
जब हम मिले थे।
तुम वैसे ही खुश रहो
जैसे तब होती हो
जब मैं तुम्हारी हथेली को
रख लेता हूँ
अपने हथेलियों के बीच।

जब भी तुम्हें लगे
कि अकेली हो तुम
तो रसोई में जाकर
एक अच्छी सी चाय बनाना
वैसी, जैसी मुझे पसन्द है।
और धीरे से लगाना उन्हें अपने होठों से।
हौले से बंद करना अपनी आँखें
फिर
मन को थोड़ा स्थिर करके
केंद्रित करना
चाय की मिठास
और कप की दीवारों के
गर्माहट भरे स्नेहिल स्पर्श पर।

ठीक इसी समय
तुम महसूस करोगी
कि
मैं पास हूँ तुम्हारे
बिल्कुल पास
क्योंकि जहाँ तुम हो
वहीं मैं हूँ
क्योंकि तुम्हारे पास होना
जीवन की सार्थकता है।

              -मोहित

Friday, 16 March 2018

हस्ताक्षर

शब्दों का मायाजाल है तुम प्रेम के अक्षर दे दो
गीतों की लय मैं साध रहा तुम आ जाओ स्वर दे दो।।

हम तुम मिलकर शब्द शब्द को चुन चुन द्वार सजायेंगे
हम तुम मिलकर कवितामय जीवन आधार बनाएंगे
हम तुम मिलकर मानवता रूपी इक हार बनाएंगे
हम तुम मिलकर शांतिपूर्ण सुंदर संसार बसायेंगे

जूझ रहा हूँ यहाँ अकेला पथरीली इन राहों में
 साथ रहो राहों में मेरे ठोकर को ठोकर दे दो।।

हम तुम मिलकर वंचित लोगों की हर क्षुधा मिटायेंगे
हम तुम मिलकर गरल भरे प्यालों को सुधा बनाएंगे
हम तुम मिलकर राहों कोकाँटों से मुक्त बनाएंगे
हम तुम मिलकर कठिनाई की आसाँ विधा बनाएंगे

होकर साथ जहाँ के आओ प्रश्न सभी हल कर दें हम
इस इजहार पत्र पर तुम अब अपने हस्ताक्षर दे दो।।

Friday, 16 February 2018

खोता हुआ बचपन


मैं ढूंढ रहा था एक रोज
कुछ बच्चों में मेरा बचपन।

मैं बसन्त की लहरों में इक गाँव गया
मैंने देखा कुछ भैंस चराते बच्चों को
मैं ठहर गया
हिम्मत करके ये पूछ लिया मैंने आखिर
क्या खेल कूद अब नहीं तुम्हारे होते हैं?
एक बोला
साहब रोज काम पर जाता हूँ
दिन भर की मेहनत करके जब वापस आता
दो जून के भोजन किसी तरह खा पाता हूँ।
फिर चले गए वो
उनसे रुककर मैंने कुछ बतियाना चाहा
पर उनको फ़िकर शीघ्र काम पर जाने की थी।

फिर मैंने भी अपनी राह चुनी
इस बार एक दरवाजे पर
चिल्लाने की कुछ ध्वनि आयी
मैंने थोड़ा सा ध्यान दिया
एक बालक की आवाजें थीं
मोबाइल की माँग थी उसकी
वह बार बार ये कहता था
मोबाइल दे दो
गेम खेलना है मुझको।
माँ की थोड़ी सी विवशता थी
उसकी तनख्वाह न आई थी
फिर क्या था
बच्चे की वह जिद रौद्र रूप में बदल गयी
और पास पड़े चाकू से उसने वार किया
माँ की चीख सुनी मैंने
अंदर आया फिर देखा ये
लथपथ थी माँ रक्त बह रहे थे उसके।
मैन देखा
बचपन अब बचपन नहीं रहा।
वह बड़ा हुआ अब
या कहें कि
अब तो
आता नहीं कोई बचपन
है कहीं मोबाइल की डिमांड
फिर आभासी दुनिया मे जाकर
ठुकराकर यथार्थ को
बचपन मरता है
या कही गरीबी में पड़कर
जीने की इच्छा शक्ति
काम करवाती है।
पर एक बात मैं जान गया
अब बचपन की दुनिया ही नहीं
यह तो बस एक कल्पना है
जो दिखती है कविताओं में।
अब क्या होगा इस मानव का
जो सुनता नहीं पिता और माँ की बातों को
चलने की ताकत पाते ही
उसका बचपन अब बड़ा हुआ
चाहे वो काम पर जाना हो
या मोबाइल पर गेम और आभासी दुनिया
इन सबने बचपन मारा है।

हैं मिले मुझे ऐसे
अनगिनत उदाहरण जो
मुझको विश्वास दिलाते हैं
अब आती सिर्फ जवानी है
अब खो ही गया समझो बचपन
जब ढूंढ रहा था एक रोज
कुछ बच्चों में मेरा बचपन।

Sunday, 21 January 2018

प्रेम और स्वार्थ

प्रेम और स्वार्थ
आधे अक्षरों से शुरू ये भाव
एक बार दोनों में युद्ध शरू हुआ
प्रेम ने पटखनी दे दी स्वार्थ को
वो इतिहास था।
इन दोनों में फिर युद्ध शुरू हुआ
इस बार मनुष्यों ने स्वार्थ के साथ दिया
इस बार प्रेम हार गया
न केवल हारा,
बल्कि मरने की स्थिति में पहुँच गया
यह समय वर्तमान है।

         -मोहित

Friday, 12 January 2018

कहानी मरते अहसास की

मेरे अंतिम दिन निकट हैं
जल्द ही चल पड़ूँगा
परम धाम को।
एक कष्ट मुझे वहाँ भी सताएगा
और वो ये है
कि मुझे चार कंधों पर लादकर
न तो किसी ने मुझे अग्नि को सौंपा
न ही किसी ने मिट्टी दी।

इतना होने पर भी
मैं चाहता हूँ कि फिर आऊँ
मैं उस परमशक्ति से याचना करूँगा
पुनर्जन्म की।
मेरी चाहत है कि इस संसार मे विद्यमान रहूँ
और संसार मुझे ही नष्ट करने में जुटा है।

हर तरफ से मेरे शरीर पर प्रहार हो रहा है
कभी भूखे को नजरअंदाज करने पर
तो कभी पर स्त्री पर नजरें डालने पर।

आज तो हृदयाघात होते होते बचा
वो बस अपने पिता को मारने वाला था
पर रुक गया
क्योंकि उसका मोबाइल बज उठा था।

पर कब तक बचता रहूँगा
ऐसे हालात में
जब कोई रखना ही नहीं चाहता मुझे।
मैं ही तो जबरदस्ती गले पड़ना चाहता हूँ सबके
और जबरदस्ती कब तक बन्धा रहूँगा।

घायल और दुर्बल
बूढ़ा और असहाय
पड़ा रहता हूँ दुबककर
बस कभी कभी आ जाता हूँ
पैसे न कमाती हुई माँ से मिलने
लालच रहित कवि के पास
और छोटे बच्चों के साथ मुलाकात करने।
पर ये भी कब तक रखेंगे
माँ कब तक पैसे नहीं कमाएगी
मंच और प्रसिद्धि की लालच कवि के पास आ जायेगी
और बच्चे बड़े भी तो हो जाएंगे।

मुझे संघर्ष पसन्द है
इसलिए अब तक जीवित हूँ
पर जानता हूँ
मेरे अंतिम दिन निकट हैं।

                

हम नौका पर बैठ

हम नौका पर बैठ चलो उस पार चलें।

अब तक जिसने धर्म न जाना
कहता है ये धर्मयुद्ध है
खा जाएगा उसको कच्चा
दिखता ऐसा क्रूर क्रुद्ध है
आये दिन अखबारों में
रहती हैं खबर विवादों की
भोली जनता तो दीवानी
रही चुनावी वादों की
जहाँ शांति का परचम लहरे
हम ऐसे दरबार चलें
हम नौका पर बैठ चलो उस पार चलें।

जहाँ बेटियाँ रहें सुरक्षित
खेलें खाएं मस्त रहें
एक दूसरे की खुशियों में
सभी जहाँ मदमस्त रहें
जहाँ नीतियाँ न्याय परक हो
सत्ता का भुजदण्ड न हो
द्वेष, ईर्ष्या, लालच, कटुता
और जहाँ पाखण्ड न हो
हृदय खोलकर स्वागत होवे
आओ ऐसे द्वार चलें
हम नौका पर बैठ चलो उस पार चलें।

जहाँ के बच्चे भीख नहीं
शिक्षा के लिए समर्पित हों
संग्रह से सब दूर रहें
बस दान पुण्य को अर्पित हों
किसी हृदय की पीड़ा दूजे
की आंखों में छलक उठे
और किसी की खुशियों में
जन मन के नैना चमक उठें
जहाँ न कोई बंटवारा हो
हम ऐसे संसार चलें
हम नौका पर बैठ चलो उस पार चलें।

                  -महेंद्र कुमार मिश्र 'मोहित'

Saturday, 23 December 2017

23 दिसंबर

आज 23 दिसंबर है। ठीक 2 वर्ष पहले कुछ ऐसा हुआ जिससे ये दिन अविष्मरणीय बन गया। हुआ दरअसल ऐसा.......

"मुझे आज सुबह से काफी स्पेशल फील हो रहा था" उत्साह में आते हुए उसने कहा।
जवाब में मैं बस मुस्कुरा दिया।
उस दिन वो बस बोलती ही जा रही थी। "आर्यन ये", "आर्यन वो" लगातार उसने काफी कुछ कह दिया। मैं बस उसकी खुशियों को देख रहा था। जवाब में कभी कभी "हाँ", "अच्छा", "ठीक है" और एक मुस्कान। मैं बस उसको सुनना चाह रहा था। मुझे पता था कि बहुत सी बातें होंगी उसके पास मुझसे कहने के लिए।
29 अगस्त के बाद आज वो मुझसे मिल रही थी।
इस लंबे अंतराल में काफी बदलाव आ गए थे उसके जीवन में। वो चश्मा भी लगाने लगी थी।
फेसबुक पर अचानक से हुई हमारी मुलाकात दोस्ती में बदली। फिर नम्बरों का आदान प्रदान हुआ और बातें फ़ोन पर आ गईं। मैंने कभी उसका चेहरा नहीं देखा था, और फ़ोटो भी नहीं। मैंने कभी उसको फ़ोटो भेजने को नहीं कहा  जिससे कि उसे असहज न महसूस हो। उससे बातें करना मेरी दिनचर्या का प्रमुख अंग बन गया था। जिस दिन उससे कम बातें होतीं, अधूरा अधूरा से लगता। दिनचर्या में शामिल होने के बाद धीरे धीरे वो मेरे दिल में जगह बनाने लगी। उसके विचारों से प्रेम हो गया था मुझे। वो खुले विचारों की लड़की थी, जो समाज के लिए कुछ करना चाहती थी।
एक दिन मैंने उससे अपने प्रेम का इजहार कर दिया। जवाब में उसने जो कहा वह अद्भुत था और उसने मुझमें अनंत खुशियों का संचार किया। उसने कहा था "आर्यन अगर तुम मुझे आज ये शब्द न बोलते तो शायद मैं बोल देती"।
उस दिन के बाद से हम दोनों में खूब बातें होतीं।
यूँ लगता जैसे किसी ने हमें खुशियों के समुंदर में लाकर छोड़ दिया हो। दिन बीतने लगे।
कहते हैं, कि समय मोड़ लेता है। मेरा एक मैसेज पढ़ते ही उसके पिताजी मुझसे आग बबूला हो गए। गनीमत रही, कि मैं उनके सामने न था। वरना मैं होता ही न।
उसी दिन से हमारी बातचीत बन्द हो गयी थी। हमें एक दूसरे का कुछ पता न था। उसने फेसबुक चलाना बन्द कर दिया था और मैं भी सोशल साइट्स पर बहुत कम सक्रिय रहता था। उसके पिता जी ने उसका फ़ोन नम्बर भी चेंज करवा दिया।
मुझे उसके स्कूल का पता था और उस दिन न जाने क्या हुआ, कि मैं उसके स्कूल की तरफ चल पड़ा।
मैं उत्साह में था पर डर भी रहा था, कि वो मुझे पहचानेगी या नहीं? वो अब भी मुझसे प्यार करती है नहीं?
वो अब भी वहाँ पढ़ती है, या कहीं और?
इन तमाम सवालों को सोचते हुए मैंने उसके स्कूल में प्रवेश किया। मैं उसके क्लास में चल गया, छुट्टी हो चुकी थी, और बच्चे एक पंक्ति में बाहर आ रहे थे। एक लड़की को देखा, तो मेरे दिल ने कहा कि हो न हो, ये स्नेहा ही है। मैंने तभी किसी को उसे बुलाते हुए सुना। सच, ये स्नेहा ही थी।
स्नेहा, माथे पर चंदन, आंखों में चश्मा, होठों पर हल्की सी मुस्कान। ऐसा लग रहा था जैसे वो किसी बीते हुए लम्हे को याद कर रही हो।
मैं उसके सामने गया और वो एकदम से चौंक गयी। उसका चेहरा उत्तेजना में लाल हो गया। हम दोनों की आँखों में आँसू की नन्हीं बूँदे घिर आईं।
आज हम दोनों एक दूसरे को प्रथम बार देख रहे थे।
हमने अपने मन में जिन सपनों के बीज बोए थे, अब लग रहा था कि वो पूरे हो जाएंगे। ये प्रथम मिलन, बस प्रथम मिलन ही नहीं था, इसमें सपनों को उगाने की क्षमता थी।
इसमें हम दोनों में भीतर से खुशियों और उत्साह का संचार किया था।
ये प्रथम मिलन इस बात का प्रमाण था, कि इंटरनेट पर बने रिश्तों में भी प्रेम होता है।
ये इस बात का प्रमाण था, कि समस्याएं कितनी भी हों, सपने देखे भी जा सकते हैं, और उनके पूरे होने की उम्मीद भी की जा सकती है।
मुझे ये दिन इसलिए नहीं याद, कि इस दिन मैं प्रथम बार स्नेहा से मिला, बल्कि मुझे उन तमाम पूर्वाग्रहों के टूटने के लिए याद है, जो मानते हैं, कि कुछ पल साथ न रहने से लड़कियाँ दूसरी ओर आकर्षित हो जाती हैं। ये इसलिए अविष्मरणीय है, क्योंकि इस दिन वो तमाम लोग झूठे साबित हुए जो मानते हैं, कि किशोरावस्था के रिश्ते महज शारीरिक आकर्षण होते हैं। और हमने ये सिद्ध किया था।
 
   
                                    -मोहित

जीवन तुम संग

तुम बिना कैसे जीवन गुजारूँगा मैं
लौट आओ प्रिये दूर जाओ न तुम।
था ये वादा कि हम साथ होंगे सदा
मान रख लो ये वादा भुलाओ न तुम।
 
फूल की वाटिका जैसी सद्गन्ध में
हो सनी जैसे राघव की सीता हो तुम
हो कि यमुना किनारे की वृषभानुजा
गीत वंशी मेरी, मेरी गीता हो तुम
द्वार अपने हृदय का प्रिये खोल दो
सुन लो अर्ज़ी मेरी यूँ सताओ न तुम।

रूप देखूँ तुम्हारा तो होवे सुबह
और केशों के साये में ही रात हो
ऐसी चंचल हो तुम जैसे दीपक की लौ
और कोमल छुअन जैसे जलजात हो
मेरी खुशियाँ तुम्हारी ही मुस्कान है
रो रहा हूँ कि यूँ रूठ जाओ न तुम।
           (महेंद्र कुमार मिश्र 'मोहित')

Sunday, 17 December 2017

ग़ज़ल

गाना गाते घूम रहे हैं
गाल बजाते घूम रहे हैं।

उनको भी फिर रोना होगा
अभी रुलाते घूम रहे हैं।

मुझको ज़हर पिलाने वाले
मौज मनाते घूम रहे हैं।

झूठ छिपा न पाये आखिर
बात बनाते घूम रहे हैं।

छीन लिया मेरी खुशियों को
खुद बलखाते घूम रहे हैं।

खुद उठ जाने के लालच में
मुझे गिराते घूम रहै हैं।

'मोहित' सीधी बात न कहते
मिसरा गाते घूम रहे हैं।

           

Wednesday, 29 November 2017

ग़ज़ल (भूख)

खून चूस जनता का डाला फिर भी चैन नहीं तुमको
दाल और रोटी पर ताला फिर भी चैन नहीं तुमको।

एक बूँद जल को वो रोया भटका रोज दिवा निशि में
पी तुमने अंग्रेज़ी प्याला फिर भी चैन नहीं तुमको।

भूख भूख करती थी लाडो फिर चीखी बस प्राण गए
धूम धाम तुमने कर डाला फिर भी चैन नहीं तुमको।

राम राम करते हो नेता पर छूरी भर दी घर घर
पोत दिया उन पर भी काला फिर भी चैन नहीं तुमको।

आँख देख कर आया हूँ मैं जनता खूब सिसकती है
और मजे में तुम हो लाला फिर भी चैन नहीं तुमको।

खूब ग़ज़ब करते हो बातें शक की चांस नहीं रहती
बोल बोल कर देश खंगाला फिर भी चैन नहीं तुमको।

Sunday, 12 November 2017

गंगा

गंगा
नदी नहीं है
जीवन है
और उसमें बहता जल
जल नहीं प्रेम है।
निकलती है गंगा
उछल कूद करती हुई
इधर से उधर दौड़ लगाती हुई
अपने बालपन में।
जैसे जैसे उम्र बढ़ती है
लोगों से परिचय बढ़ता है
लोग मिलने लगते हैं उसे।
एक दिन यूँ ही
यमुना ने अपना प्रेम न्योछावर कर दिया उसपर।
तबसे गंगा अकेली नहीं है
संग संग यमुना भी चलती है
पर देखो तो
कितना गहरा प्रेम है
यमुना ने समर्पित कर दिया अपना रूप रंग गंगा को
प्रेम की पराकाष्ठा।
तमाम मोड़ आते हैं गंगा के जीवन में
मुश्किलों में भी रास्ता बनाते हुए
विसर्प लेते हुए
अपने प्रौढ़ा अवस्था में पहुँचती है।
उसके सपने, उसके अपने
उसे तोड़ देते हैं
बिखर जाती है
कई धाराओं में
और अंततः
अपना कमाया हुआ
इकट्ठा किया हुआ
सब कुछ छोड़
विलीन हो जाती
चिर निद्रा में
शांति में।
हाँ!
गंगा नदी नहीं जीवन है।

प्रेम-पत्र

प्रिये! तुम कहाँ हो? कैसी हो? इन सबके बारे में मुझे कुछ नहीं पता। सिर्फ कल्पनायें कर सकता हूँ, कि जहाँ हो, कुशल से हो। बीते एक साल में जीवन...