गंगा
नदी नहीं है
जीवन है
और उसमें बहता जल
जल नहीं प्रेम है।
निकलती है गंगा
उछल कूद करती हुई
इधर से उधर दौड़ लगाती हुई
अपने बालपन में।
जैसे जैसे उम्र बढ़ती है
लोगों से परिचय बढ़ता है
लोग मिलने लगते हैं उसे।
एक दिन यूँ ही
यमुना ने अपना प्रेम न्योछावर कर दिया उसपर।
तबसे गंगा अकेली नहीं है
संग संग यमुना भी चलती है
पर देखो तो
कितना गहरा प्रेम है
यमुना ने समर्पित कर दिया अपना रूप रंग गंगा को
प्रेम की पराकाष्ठा।
तमाम मोड़ आते हैं गंगा के जीवन में
मुश्किलों में भी रास्ता बनाते हुए
विसर्प लेते हुए
अपने प्रौढ़ा अवस्था में पहुँचती है।
उसके सपने, उसके अपने
उसे तोड़ देते हैं
बिखर जाती है
कई धाराओं में
और अंततः
अपना कमाया हुआ
इकट्ठा किया हुआ
सब कुछ छोड़
विलीन हो जाती
चिर निद्रा में
शांति में।
हाँ!
गंगा नदी नहीं जीवन है।
Sunday, 12 November 2017
गंगा
Thursday, 5 October 2017
मुक्तक
जिसे हर क्षण निहारूँ मैं मेरी वो कल्पना तुम हो
मेरी रग रग में तुम ही हो मेरी धड़कन भी तुम से है
तुम्हीं आराध्य हो मेरे मेरी आराधना तुम हो
तुम्हीं संग लौट कर खुशबू मेरी साँसों में आई है
तेरे प्यारे से मुखड़े से को चूमकर आज तो देखो
चाँदनी पूर्णिमा की फिर मेरी बाहों में आई है
माँग लूँ मैं तेरी खुशियाँ समय ये अर्चना का है
मेरा तो प्रेम ही ईश्वर, यही काशी यही मथुरा
बनूँ साधक मोहब्बत का समय ये साधना का है
सभी अर्पित करे बिन प्रेम का दरिया ये रीता है
हमारी प्रीति में आकर जो तुमने गीत गाये थे
मेरी श्रद्धा उसी में है वो रामायण है गीता है
-मोहित
Thursday, 17 August 2017
तुम आओ न
" तुम आओ न"
लगे घृणित वे सब कुछ मुझको, जो अब तक थे मनभावन
सूनी सूनी लगे डगर ये, सूना सूना सावन
प्रीति राह में फिर पायल झनकाओ न, तुम आओ न
देख रहा हूँ राह तुम्हारी कब से मैं, तुम आओ न।
जानी पहचानी चीजें भी अब लगती अनजानी
ललचाकर मुझको, मिलने में करती आनाकानी
आकर इनसे परिचय मेरा कराओ न, तुम आओ न
देख रहा हूँ राह तुम्हारी कब से मैं तुम आओ न।
बूंदे मन को तृप्त न करती, उल्टे प्यास बढ़ाये
नहर किनारा सूख गया है, फूल सभी मुरझाए
फूलों में फिर से खुशबू दे जाओ न, तुम आओ न
देख रहा हूँ राह तुम्हारी कब से मैं, तुम आओ न।
सुबह सुबह वो सैर पे जाना, मेरे मन न भाए
खिड़की से तेरी जब तक कोई पैगाम न आये
आकर अपना दर्शन मुझे कराओ न, तुम आओ न
देख रहा हूँ राह तुम्हारी कब से मैं, तुम आओ न।
तुमको मैंने पूजा, तुमको दिल में सदा सजाया
शब्द शब्द तुम से जोड़े हैं, तुमपर गीत रचाया
इन गीतों को अपने कण्ठ सजाओ न, तुम आओ न
देख रहा हूँ राह तुम्हारी कब से मैं, तुम आओ न।
जब सम्मुख तुम थी, तो सब कुछ अजब ग़ज़ब होता था
बिनमतलब के शाम के चक्कर, का मतलब होता था
शामों को फिर से मतलब दे जाओ न, तुम आओ न
देख रहा हूँ राह तुम्हारी कब से मैं, तुम आओ न।
सभी समस्याएं तब अपनी, झट से हल होती थीं
मेल नयन का होता जब, दिल मे हलचल होती थी
नैनाचार करो, हलचल फैलाओ न, तुम आओ न
देख रहा हूँ राह तुम्हारी कब से मैं, तुम आओ न।
-मोहित मिश्र
Monday, 19 June 2017
ग़ज़ल (व्यक्ति में अभिव्यक्ति)
व्यक्ति में अभिव्यक्ति होनी चाहिए
हर किसी में शक्ति होनी चाहिए।
खेल जाएँ जान पर इसके लिए
भारती की भक्ति होनी चाहिए।
पुण्य कर्मो में सदा हम रत रहें
पाप से तो मुक्ति होनी चाहिए।
हो न हिन्दू या कि मुस्लिम हम सभी
एकता की शक्ति होनी चाहिए।
जो कि अमृत पान हो मनु के लिए
वेद सी हर पंक्ति होनी चाहिए।
Friday, 2 June 2017
प्यार के बीज बोने चला हूँ (ग़ज़ल)
सब लुटाकर मिला जो भी मुझको आपका आज होने चला हूँ
गीत गाकर हृदय में सभी के प्रेम का बीज बोने चला हूँ।
तू गया जबसे बेचैन हूँ मैं अब्र आँखों में मेरी बसे हैं
तेरी यादों को सिरहाने रखकर आज तकिये भिगोने चला हूँ।
गीत-संगीत, कविता-ग़ज़ल और चूड़ियों की खनक वो निराली
चाँद की वो चमक, पायलों की झनक अब सभी को मैं खोने चला हूँ।
दिल धड़कता था तकता तुझे जब अब इसे सांस आती नहीं है
बिन तेरे है नहीं कुछ ये जीवन अब सदा को मैं सोने चला हूँ
मैं न शायर न ये शायरी है लफ्ज़ सारे हकीकत हैं मेरे
ज़िन्दगी की कहानी सुनाकर अब रुलाने औ' रोने चला हूँ।
Saturday, 27 May 2017
बस प्यार करो
जिसे देखकर अधर हमारे अनायास खुल जाते हैं
जिसकी खुशबू पाकर हम तो यूँ ही पगला जाते हैं
एक पंखुड़ी जिसकी मन को अद्भुत शांति दे जाती है
जिसपर सम्मोहित हो दुनिया निर्मल मन की हो जाती है
लेता न तनिक भी हमसे कुछ वो बस हमको ही देता है
उसको धूल मिलाकर मानव अपनी जय जय करता है
हाँ! वह दुर्बल है, कमजोर है, किन्तु बहुत ही अच्छा है
बस वो तेरा प्रेमी है प्यार उसी का सच्चा है
गर सचमुच के तुम मानव हो लालच को अस्वीकार करो
सर्वस्व लुटा दो जगती पर पूरी दुनिया से प्यार करो
यदि पढ़ना है तो पढो पुष्प से जो तेरी ख़ातिर जीता है
तुम पर सब न्यौछावर करता बिन तेरे बिलकुल रीता है
कटुता न देती तनिक चैन इसको मत अंगीकार करो
जीना है तो घुलमिल के जियो, बस प्यार करो बस प्यार करो।
Wednesday, 24 May 2017
ग़ज़ल (तुम जो छत पे)
तुम जो छत पे चढ़ के आयी,रात उजली हो गयी,
इक फलक पे चाँद दो-दो हाय तौबा मच गयी।
श्रृंगार सारे चल पड़े, चेहरा तुम्हारा देखने,
और रति ने भी शरम से मौन साधा, छुप गयी।
जिसने भी देखा तुम्हें, बस देखता ही रह गया
पलकें झपकना भूल कर सबकी निगाहें थम गयी।
इक तमन्ना ही बची मोहित तुम्हारे दिल में अब
देखे तुम्हारे ख्वाब वो भी, आँखों में जो बस गयी।
Tuesday, 23 May 2017
गीत प्यार के गाते हैं
अपनी पीड़ा गान बनाकर
मुश्किल को आसान बनाकर
आँसू को मुस्कान बनाकर
हँसते और हँसाते हैं।
गीत प्यार के..............................गाते हैं।
मुझ तक जो कुछ भी पहुँचा वो मैंने सदा लुटाया,
जितना संभव हो सकता था, मैंने प्रेम जताया,
मन में अमिट विश्वास बनाकर
अपने रुदन को हास बनाकर
रोज नया इतिहास बनाकर
आगे बढ़ते जाते हैं।
गीत प्यार के..............................गाते हैं।
जब जी आया खेला, सोया, गाया और बतियाया,
किस्मत में सब अच्छा ही है, क्या खोया-क्या पाया?
साँसों को नवगान बनाकर
गिरने को उत्थान बनाकर
'पत्थर' को 'भगवान' बनाकर
सदा पूजते जाते हैं।
गीत प्यार के...............................गाते हैं।
Saturday, 13 May 2017
ग़ज़ल (बातों को मेरी)
बातों को मेरी तू सुनना सम्भल के
आँखों को मेरी तू पढ़ना सम्भल के।
चोरों का सरदार लश्कर से बोला
कहीं खुल न जाये, तू ढंकना सम्भल के।
हरण चीर करने को बैठा दुशाशन
कहीं लुट न जाये, तू चलना सम्भल के।
मैं निकला जो घर से तो अम्मा ये बोली
कहीं ठग न जाये, तू रहना सम्भल के।
दुनिया में नज़रें बहुत सी हैं मोहित
कहीं लग न जाये, तू हंसना सम्भल के।
Thursday, 11 May 2017
ग़ज़ल (रचता हूँ मैं ग़ज़ल)
रचता हूँ मैं ग़ज़ल तेरी मुस्कान पर
साथ बीती है जो उस हंसीं शाम पर।
जो किनारों से उठती हैं माँ यमुना के
कान्हा के बांसुरी की मधुर तान पर।
मन में झंकार उठती है सुनकर जिन्हें
तेरे गाये हुए प्यार के गान पर।
जो बने साक्ष्य अपनी मुलाकात के
पनघटों पर बने प्यार के धाम पर।
Saturday, 6 May 2017
गोरी हमसे प्यार कर लो
ज़रा-सा आँखें चार कर लो
गोरी हमसे प्यार कर लो।
हर डाली से फूल चुना है
प्यार की माला रोज बुना है
राह तुम्हारी तकते तकते
प्यार बढ़ा ये कई गुना है
रहोगी मेरी पलकों पर तुम
ओ गोरी ऐतबार कर लो।
जाने कब से राह तकी है
हर पल मन में आस उठी है
प्रिये तुम्हारे इंतजार में
आँखें हज़ारों रात जगी हैं
अब आई हो अगर सामने
संग जीवन का सार कर लो।
प्रेम-पत्र
प्रिये! तुम कहाँ हो? कैसी हो? इन सबके बारे में मुझे कुछ नहीं पता। सिर्फ कल्पनायें कर सकता हूँ, कि जहाँ हो, कुशल से हो। बीते एक साल में जीवन...
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मैंने कभी कहा था- लड़ो झोंक दो पूरी ताकत तुम अपनी रोना मत तुम हार के अबकी दौर में आज जो सूरज है बादल में छुपा हुआ फिर चमकेगा खुलकर अगली भ...
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कभी कभी दिल सोचने पर मजबूर हो जाता है कि कोई इतनी मीठी बातें कैसे कर सकता है? उसकी मीठी बातें उस पर अटूट विश्वास पैदा कर देती हैं, वहीं अखबा...